जैन-धर्म 


Ø जैन-धर्म में कुल 24 तीर्थकर हुए हैं|

Ø प्रथम तीर्थंकर का नाम ऋषभदेव था ।

Ø जैन-धर्म के 23 तीर्थंकर का नाम  पार्श्वनाथ था ।

Ø जैन-धर्म के चौबीसवें एवं अन्तिम तीर्थंकर तथा प्रवर्तक महावीर थे ।

Ø जैन-धर्म के प्रमुख सिद्धान्तों की स्थापना पार्श्वनाथ ने की थी ।

Ø महावीर की माता का नाम त्रिशला एवं पिता का नाम सिद्धार्थ था ।

Ø भगवान महावीर को शाल के वृक्ष  के नीचे ज्ञान की प्राप्ति हुई और जुम्भिक ग्राम के समीप ऋजुपालिका नदी के तट पर के स्थान पर महावीर को ज्ञान प्राप्त हुआ ।

Ø ज्ञान-प्राप्ति के बाद महावीर ने सर्वप्रथम उपदेश राजगृह स्थान पर दिया था।

Ø जैन धर्म के तीन रत्न (त्रिरत्न) सम्यक् ज्ञान, सम्यक् दर्शन एवं सम्यक् चरित्र हैं ।

Ø जैन-धर्म श्वेताम्बर तथा दिगम्बरसम्प्रदायों में विभक्त है । श्वेताम्बर सम्प्रदाय के समर्थक श्वेत वस्त्र धारण करते हैं, किन्तु दिगम्बर सम्प्रदाय के समर्थक नग्न रहते हैं।

Ø का आयोजन किया गया था । इसे जैन-धर्म की प्रथम संगीति की संज्ञा दी जाती है। यह 390 ई० पू० हुई और इसमें जैन-धर्म-दिगम्बर एवं श्वेताम्बरदो सम्प्रदायों में विभक्त हो गया । इस प्रकार तुब से दक्षिणी जैन दिगम्बर तथा मगध के जैन श्वेताम्बर कहलाए ।

Ø कर्नाटक में जैन-धर्म के प्रचार का श्रेय चन्द्रगुप्त मौर्य को जाता है।
जैन-धर्म के ग्रन्थ अर्द्धमागधी भाषा में लिखे गये हैं ।